भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित/चल रहे व्यापार समझौतों को अक्सर “रणनीतिक साझेदारी” और “बाज़ार तक बेहतर पहुँच” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि इन समझौतों का सबसे गहरा असर भारत के छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ सकता है। हालिया बहस बताती है कि सस्ती आयात नीति, गैर-शुल्क बाधाओं (Non-Tariff Barriers) का हटना और कृषि सब्सिडी का असमान ढाँचा—ये सभी मिलकर भारतीय कृषि को दबाव में ला सकते हैं।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौतों को अक्सर रणनीतिक साझेदारी, निवेश वृद्धि और उपभोक्ताओं के लिए सस्ती वस्तुओं के रूप में प्रचारित किया जाता है। लेकिन जब इन समझौतों को कृषि के नज़रिये से देखा जाता है, तो तस्वीर उतनी सरल नहीं रहती। भारत जैसे देश में, जहाँ आज भी बड़ी आबादी की आजीविका खेती पर निर्भर है, किसी भी मुक्त या अर्ध-मुक्त व्यापार व्यवस्था का सीधा असर किसानों की आय, ग्रामीण रोज़गार और खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है।
सबसे बड़ी चिंता अमेरिकी कृषि सब्सिडी को लेकर है। अमेरिका में किसान भारी सरकारी सहायता के कारण बाज़ार की अस्थिरता से काफी हद तक सुरक्षित रहते हैं। फसल बीमा, प्रत्यक्ष आय सहायता और आपदा राहत जैसी व्यवस्थाएँ वहाँ सामान्य हैं। इसके विपरीत, भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य और अन्य सहायता योजनाएँ सीमित हैं और अक्सर लागत वृद्धि की भरपाई भी नहीं कर पातीं। नतीजतन, अमेरिकी कृषि उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सस्ते पड़ते हैं और भारतीय किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा असमान हो जाती है।
तथ्य
अमेरिका में औसत किसान-समर्थन भारत से कई गुना अधिक है—यही कीमत-प्रतिस्पर्धा का मूल कारण है।
जोखिम
सेब और डेयरी जैसे क्षेत्रों में सस्ते आयात से स्थानीय अर्थव्यवस्था सबसे पहले प्रभावित होती है।
राजनीति
व्यापार समझौते अक्सर भू-राजनीति से संचालित होते हैं—जैसा कि Donald Trump के दौर की टैरिफ नीतियों में दिखा।
चेतावनी
यदि किसानों की सुरक्षा नहीं हुई, तो समझौते से असमानता बढ़ सकती है—उपभोक्ता लाभ बनाम उत्पादक नुकसान।
यदि भारत–अमेरिका व्यापार समझौते के तहत आयात शुल्क घटाए जाते हैं या गैर-शुल्क बाधाएँ हटाई जाती हैं, तो सेब, मक्का, सोयाबीन, कपास और डेयरी जैसे क्षेत्रों में सस्ते आयात का दबाव बढ़ सकता है। इसका सीधा असर घरेलू कीमतों पर पड़ेगा। कीमतें गिरने से उपज बिकेगी तो सही, लेकिन लाभ घट जाएगा, जिससे छोटे और सीमांत किसानों की आर्थिक स्थिति और कमजोर हो सकती है। पहाड़ी और वर्षा-आश्रित इलाकों में यह असर और भी गहरा होगा।
यह समस्या केवल खेती तक सीमित नहीं रहती। कृषि भारत में ग्रामीण रोज़गार की रीढ़ है। जब किसानों की आय घटती है, तो खेत मज़दूरी, स्थानीय परिवहन, भंडारण, प्रसंस्करण और छोटे व्यापार भी प्रभावित होते हैं। इस तरह एक व्यापार समझौता, जो काग़ज़ पर “आर्थिक सुधार” दिखता है, ज़मीनी स्तर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को झटका दे सकता है।
समझौते के समर्थक यह तर्क देते हैं कि इससे तकनीक हस्तांतरण, विदेशी निवेश और निर्यात के नए अवसर मिलेंगे। यह तर्क पूरी तरह गलत नहीं है। दीर्घकाल में उत्पादकता बढ़ाने और मूल्य श्रृंखला सुधारने की संभावनाएँ मौजूद हैं। लेकिन सवाल यह है कि संक्रमण काल में किसानों की सुरक्षा कैसे होगी? यदि सुरक्षा उपाय नहीं हुए, तो लाभ बड़े कॉरपोरेट और उपभोक्ताओं तक सीमित रहेंगे, जबकि नुकसान किसान उठाएंगे।
नीतिगत असंतुलन की जड़ वैश्विक व्यापार व्यवस्था में भी है। विकसित देश अपने कृषि क्षेत्र को रणनीतिक मानकर संरक्षण देते हैं, जबकि विकासशील देशों पर बाज़ार खोलने का दबाव अधिक रहता है। ऐसे में भारत के लिए ज़रूरी है कि वह अपने हितों की स्पष्ट पहचान करे और संवेदनशील फसलों के लिए विशेष सुरक्षा प्रावधान तय करे।
आगे का रास्ता संतुलन में है। भारत को चाहिए कि वह सेब, डेयरी, कपास और दालों जैसी संवेदनशील फसलों को विशेष श्रेणी में रखे; सीमित मात्रा तक आयात की अनुमति देकर उसके बाद ऊँचा शुल्क लगाए; और घरेलू समर्थन तंत्र—MSP, फसल बीमा और मूल्य स्थिरीकरण—को मज़बूत करे। साथ ही, किसानों और छोटे उद्यमों को नए मानकों के अनुरूप ढलने के लिए समय और सहायता दी जाए।
भारत–अमेरिका व्यापार समझौता अपने आप में न तो पूर्ण अवसर है और न ही पूर्ण संकट। इसका परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत किसान-केंद्रित दृष्टिकोण के साथ बातचीत और क्रियान्वयन करता है या नहीं। यदि किसानों की आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो यह समझौता विकास से अधिक असमानता बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।
We strive to make a lasting impact on India’s policy and planning landscape through fair, unbiased, and incisive research based journalism.
But we can’t do it alone.
Together, we can create a better India, where policies are fair, planning is unbiased, and the truth prevails. Your contribution matters, and we shall be immensely grateful for your support.
