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जब एक किताब सवाल बन जाए

पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे के संस्मरण को लेकर उठा विवाद केवल एक किताब तक सीमित नहीं है। इस पुस्तक को लेकर अनिर्णय की स्तिथि ने राष्ट्रीय सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रशासनिक पारदर्शिता समेत पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए है।
Ritesh Sharma
Editor

भारत के पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की आत्मकथा Four Stars of Destiny किसी साहित्यिक बहस का विषय नहीं बनी, बल्कि यह संविधान, राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन की एक महत्वपूर्ण परीक्षा बन गई है।
रक्षा मंत्रालय के रिकॉर्ड, जो हाल ही में सूचना के अधिकार के तहत सामने आए, बताते हैं कि 2020 से 2024 के बीच सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों की 35 पुस्तकों को प्रकाशन स्वीकृति के लिए भेजा गया। इनमें से अधिकांश को मंजूरी मिल गई। लेकिन जनरल नरवणे की पुस्तक अकेली ऐसी रही, जो अब भी लंबित है। निस्संदेह, राष्ट्रीय सुरक्षा कोई साधारण विषय नहीं है। सैन्य अनुभवों से जुड़ी किसी भी पुस्तक में गोपनीय जानकारियों की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी कारण से सेवानिवृत्त अधिकारियों के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था बनाई गई है।
व्यवस्था तो बेहतर है परंतु सवाल यह है कि क्या यह प्रक्रिया समान और पारदर्शी है?
यदि समान परिस्थितियों में अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की पुस्तकें स्वीकृत हो चुकी हैं, तो केवल एक पुस्तक को रोके रखना स्वाभाविक संदेह को जन्म देता है। लोकतंत्र में प्रशासनिक निर्णयों का मूल्यांकन केवल नीयत से नहीं, बल्कि प्रक्रिया और समानता से होता है।

राजनीति का प्रवेश

इस पुस्तक के कुछ अंश सार्वजनिक होने के बाद विपक्ष द्वारा सरकार की आलोचना की गई। यहीं से यह मुद्दा राजनीतिक बहस में बदल गया। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक असहजता और राष्ट्रीय सुरक्षा को एक ही तराजू पर नहीं तौला जा सकता।
यदि किसी पुस्तक को इसलिए रोका जाता है कि वह सत्ता के लिए असुविधाजनक प्रश्न उठाती है, तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अनकहा अंकुश माना जाएगा।


प्रशासनिक चुप्पी का अर्थ
इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि निर्णय के पीछे कोई स्पष्ट और सार्वजनिक रूप से घोषित कारण सामने नहीं आए हैं। न रक्षा मंत्रालय ने और न ही प्रकाशक ने यह बताया कि आखिर किन ठोस आपत्तियों या आपराधिक–सुरक्षा संबंधी आशंकाओं के आधार पर इस पुस्तक को रोका गया। यह मौन केवल सूचना का अभाव नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।


कानूनी नजरिए से देखें तो
लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे निर्णय, जिनके समर्थन में स्पष्ट, तर्कपूर्ण और लिखित आधार नहीं होते, कानूनन अस्तित्वहीन होते है। न्यायालय निरंतर यह स्पष्ट करते रहे है कि किसी भी प्रशासनिक निर्णय की वैधता उसके पीछे दिए गए कारणों पर टिकी होती है। जब ये कारण अनुपस्थित रहते हैं, तो ऐसा निर्णय सहज ही मनमाना और पक्षपातपूर्ण प्रतीत होने लगता है।

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1. जनरल नरवणे की किताब और लोकतंत्र की कसौटी
एकमात्र लंबित किताब

2020–24 के बीच रक्षा मंत्रालय ने 35 सैन्य पुस्तकों को मंजूरी दी, लेकिन जनरल नरवणे की किताब अकेली रही जो लंबे समय तक स्वीकृति से वंचित रही।

2. समानता के सिद्धांत पर प्रश्न

समान परिस्थितियों में अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की किताबें पास होना और एक किताब का अटकना प्रशासनिक समानता पर गंभीर सवाल उठाता है।

3. राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम असुविधाजनक सच

सुरक्षा के नाम पर रोक तभी उचित है जब उसके स्पष्ट और ठोस कारण हों, न कि राजनीतिक या वैचारिक असहजता के चलते।

4. कारणों की कमी, भरोसे की कमी

रक्षा मंत्रालय की ओर से स्पष्ट लिखित कारणों का अभाव इस पूरे विवाद को और गहरा करता है।

5. लोकतंत्र के लिए बड़ा संदेश

यह मामला तय करेगा कि क्या सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी अपने अनुभव निर्भीक होकर साझा कर सकते हैं या नहीं—और यही किसी लोकतंत्र की असली कसौटी है।

पारदर्शिता का अर्थ केवल सूचना देना नहीं है; यह शासन और नागरिकों के बीच विश्वास का सेतु होती है। लेकिन इस पुस्तक के मामले में दिखाई देने वाली प्रशासनिक चुप्पी यह संकेत देती है कि निर्णय प्रक्रिया निष्पक्ष से अधिक राजनीतिक से प्रेरित हो सकती है। इसी आशंका ने इस विवाद को साधारण प्रशासनिक विलंब से आगे बढ़कर एक गंभीर लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
जनरल नरवणे का मामला एक व्यक्ति या एक पुस्तक तक सीमित नहीं है। यह उन सैकड़ों सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों के लिए भी संदेश है, जो अपने अनुभवों को इतिहास के पन्नों में दर्ज करना चाहते हैं। प्रश्न यह है कि क्या वे अपने अनुभव निर्भीक होकर साझा कर सकते हैं, या हर संवेदनशील सत्य को “सुरक्षा” की परिभाषा में लपेट कर समेट दिया जाएगा?
एक सशक्त लोकतंत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक होती हैं।
जनरल नरवणे की पुस्तक को लेकर उठा विवाद सरकार के लिए अवसर है—स्पष्ट, समान और तर्कसंगत प्रक्रिया स्थापित करने का।
क्योंकि जब एक किताब सवाल बन जाती है, तब असल सवाल किताब का नहीं, लोकतंत्र का होता है।

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