सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वनभूमि पर अतिक्रमण देश की सबसे गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों में से एक है — लेकिन इसे मनमानी से नहीं, केवल संविधानसम्मत और विधिसम्मत प्रक्रिया से ही हटाया जाएगा- — रितेश शर्मा, संपादक
वनभूमि पर अतिक्रमण अब कोई स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पारिस्थितिक संकट बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट का ताज़ा फैसला इसी कड़वी सच्चाई को उजागर करता है — जंगल बचाना ज़रूरी है, लेकिन क़ानून को कुचलकर नहीं।
असम के आरक्षित वनों से अतिक्रमण हटाने के राज्य सरकार के कदम को मंज़ूरी देते हुए न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने एक बुनियादी संवैधानिक संदेश दिया: पर्यावरण संरक्षण और विधि का शासन विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यह कोई नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि संवैधानिक अनिवार्यता है। फिर भी, यह वही राज्य है जिसने वर्षों तक अवैध बसावटों को फलने-फूलने दिया — अब अचानक सख़्ती दिखाना प्रशासनिक विफलता पर पर्दा डालने जैसा लगता है।
आंकड़े चौंकाते हैं — लगभग 3,62,082 हेक्टेयर वनभूमि पर कब्ज़ा, यानी असम के कुल वन क्षेत्र का करीब 19.92 प्रतिशत। यह सिर्फ “अतिक्रमण” नहीं, पर्यावरण के खिलाफ धीमी हिंसा है। जब जंगल सिकुड़ते हैं, तो बाढ़ बढ़ती है, जैव-विविधता मरती है और अंततः इंसान भी असुरक्षित होता है।
याचिकाकर्ताओं का दावा है कि वे दशकों से वहां रह रहे हैं और उनके पास आधार, राशन कार्ड जैसे दस्तावेज हैं। सहानुभूति समझ में आती है — लेकिन सहानुभूति जमीन का कानूनी हक नहीं बन जाती। असली दोषी वे सरकारी तंत्र हैं जिन्होंने बिना जांच ऐसे दस्तावेज बांटे और आज उसी जनता को बेदखली के कगार पर खड़ा कर दिया।
अदालत ने “बुलडोज़र न्याय” से बचने के लिए उचित प्रक्रिया तय की — नोटिस, सुनवाई, दस्तावेज़ों की जांच और 15 दिन का समय। यह जरूरी संतुलन है। यदि भूमि वास्तव में आरक्षित वन में है, तो कब्ज़ा हटेगा; यदि वह राजस्व क्षेत्र में है, तो मामला राजस्व विभाग देखेगा। सीधी बात — तथ्य पहले, कार्रवाई बाद में।
लेकिन बड़ा सवाल जस का तस है: क्या भारत पर्यावरण बचाते हुए लोगों का न्यायपूर्ण पुनर्वास कर पाएगा? या हम हर बार या तो जंगल कुर्बान करेंगे, या गरीब?
सुप्रीम कोर्ट ने लाइन खींच दी है — जंगल की रक्षा होगी, मगर कानून के दायरे में। अब असम ही नहीं, पूरे देश की परीक्षा है कि वह संरक्षण को संवेदनशीलता के साथ लागू कर सकता है या नहीं।
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